नमक लफ़्ज़ का
सौरभ शुक्ल
Sunday, March 17, 2013
गंदा है पर धंधा है ये!!!
Sunday, July 29, 2012
अन्ना का ये अनशन कब तक?
Saturday, December 31, 2011
कैलेंडर बदल गया
कैलेंडर बदल गया कि नया साल आया है
उम्मीदों का नया पिटारा लाया है
क्या रहा अधूरा पिछले साल में
ये रहा किसे अब याद
आगे जो हो सब अच्छा हो
सब डूबे इस फरियाद में
क्योंकि
कैलेंडर बदल गया कि नया साल आया है
उम्मीदों का नया पिटारा लाया है
मैंने भी मांगा है इस साल से
कि हो कुछ नया नवेला
मनमोहन का टूटे मौन
भ्रष्टाचार मुक्त हो नया सवेरा
क्योंकि
कैलेंडर बदल गया कि नया साल आया है
उम्मीदों का नया पिटारा लाया है
सबके घर में हो खाने को रोटी
बहन मायावती हों अब और न मोटी
जो हुआ न हो पूरा पिछले साल में
वो रहे न अधूरा अबकी साल में
क्योंकि
कैलेंडर बदल गया कि नया साल आया है
उम्मीदों का नया पिटारा लाया है !!!
Friday, December 30, 2011
अदबी इदारों में दम घुटता था जिसका, चला गया
अपने ठेठ और गंवई अंदाज़ के लिए मशहूर अदम साहब का जन्म 22 अक्टूबर 1947 को उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले में पसरपर के आटा गांव में हुआ था. ये गांव गोस्वामी तुलसीदास के गुरु स्थान सूकर क्षेत्र के बेहद करीब है. स्वर्गीय श्रीमती मांडवी सिंह और श्री देवी कलि सिंह के पुत्र अदम कबीर परंपरा के कवि थे. बस कहीं फ़र्क है तो वो ये कि कबीर जी ने कभी कागज़ कलम नहीं छुआ और इन्होंने उसे छुआ था. लेकिन बस उतना ही जितना एक किसान ठाकुर के लिए ज़रूरी होता है.
आज़ादी के ठीक बाद की पैदाइश का असर उनके आज़ाद ख़्यालों में साफ नज़र आता था. तभी तो वह कहते हैं...
देखना सुनना व सच कहना जिन्हें भाता नहीं
कुर्सियों पर फिर वही बापू के बंदर आ गए.
कल तलक जो हाशिये पर भी न आते थे नज़र
आजकल बाजार में उनके कलेंडर आ गए.
वो ज़मीन से किस तरह जुड़े हुए शख़्स रहे हैं इसका एक नज़ारा उनकी इस कविता से मिलता है...
पूरा लेख पढ़ें...
Tuesday, July 12, 2011
अफ़साना
Saturday, June 25, 2011
कलावती की चिट्ठी
आदरणीय राहुल गांधीजी,
मेरा नाम कलावती है...मैं वो विदर्भ वाली कलावती नहीं जिसका ज़िक्र आपने संसद में किया था. न ही उनमें से कोई जिनके घर लालटेन की रोशनी में आपने निवाले खाए थे. मैं देश के हर गांव में रहने वाली कलावती हूं जिसके उजाले में रहने के अधिकार पर कल आपकी पार्टी वाली सरकार ने कटौती कर दी है.
कल शाम तो मेरी आम शाम जैसी ही रही लेकिन आज की सिर्फ़ शाम ही नहीं रात भी अंधेरी है. आज सुबह जब से पता चला कि आपकी सरकार ने मिट्टी के तेल के दाम बढ़ा दिए हैं उसके बाद से मेरे दिलो दिमाग़ पर तो अंधेरा छाया ही था अब मेरे घर में भी अंधेरा छाया है.
आपकी सरकार तो मिट्टी का तेल 2 रु ही महंगा करके देश के ऊपर एहसान करने का दावा कर रही है लेकिन असल में इन 2 रुपयों से घर में 3 दिन की रोशनी होती थी. अब ये 3 दिन घर में अंधेरे में बिताने की चिंता सता रही है.
तीन साल से पैसे जोड़ कर रखे थे कि सिलेंडर-चूल्हा खरीदुंगी क्योंकि मेरी बेटी मुन्नी जब भी चूल्हे में खाना बनाती है उसकी आंखों में आंसू आ जाते हैं. लेकिन जब पिछले साल मिट्टी के तेल के दाम बढ़े थे तब से हिम्मत गैस खरीदने की हिम्मत जवाब देती जा रही है.
1 जुलाई को उसका जन्मदिन है और उसके पिता उस दिन उसे यही तोहफ़ा देना की हिम्मत फिर से जुटा रहे थे और इसके लिए कर्जा लेने के बारे में भी सोच रहे थे लेकिन अब तो उनका भी माथा चकरा रहा है क्योंकि आपने मिट्टी के तेल के साथ साथ गैस भी तो महंगी कर दी है.
समझ में नहीं आ रहा है कि अब क्या करूं. मुन्नी के बापू बता रहे थे कि आपने डीजल भी महंगा करवा दिया है तब तो बस, टैम्पो का किराय भी बढ़ जाएगा. अब शहर जाने के लिए भी ज्यादा पैसे देने पड़ेंगे. और तो और दाल, चावल, नमक सब महंगा हो जाएगा. इतने पैसे आएंगे कहां से ये भी आपने सोचा है कभी.
हमेशा हमारा नाम इस्तेमाल करके आप आपनी छवि तो रिन की सफेदी से ज्यादा चमकदार बना लेते हैं लेकिन क्या इसके बदले में हमारा अंधेरा दूर करना आपका दयित्व नहीं है.
अब मेरी ही मति मारी गई है जो आप से उम्मीद लगाए बैठी हूं कि आप मेरे घर में उजियारा लाएंगे. अरे आप तो जो उजाला है उसमें भी बट्टा लगाते जा रहे हैं. वैसे भी आप मेरे घर में उजाला क्यों करेंगे भला. आपके घर में तो चिमनी जलती नहीं होगी...न ही आपको पैसे खर्च करने पड़ते हैं इसके लिए. आप तो राजयोग लेकर पैदा हुए हैं न.
जब आपने कलावाती का नाम संसद में लिया था तब मैं भी अपने आपको धन्य महसूस कर रही थी कि कम से कम एक आप तो हैं जिन्हें भारत के दूर दराज़ गावों में रहने वालों की फ़िक्र है और जो उनका ज़िक्र भी करते हैं लेकिन आज मैं अपने आप को ठगा सा महसूस कर रही हूं. ऐसा लग रहा है मानो आपकी पार्टी को वोट देकर हमने ग़लती की है.
ख़ैर जो हुआ सो हुआ और इसे सुधारने या बदलने के लिए तो अभी 2 साल 11 महीनों तक का और इंतजार करना पड़ेगा. इस बीच आप जितना अंधेरा करना चाहें कर सकते हैं क्योंकि हमने आपको आपको ये करने का अधिकार दिया है. हम असहाय हैं इसका आप जितना भी फ़ायदा उठाना चाहें उठा सकते हैं. लेकिन ये आप भी जानते होंगे कि ये ग़लत हैं..धोखा है और इसकी उम्मीद हमें आपसे बिल्कुल भी नहीं थी.
पता नहीं आप मुझे अपना मानते हैं या नहीं लेकिन फिर भी...
आपकी
कलावती
Sunday, June 19, 2011
Saturday, June 4, 2011
इक पोस्ट भीगी भागी सी...
सौरभ शुक्ल
चिलचिलाती धूप में राहुल पसीना पोछते हुए सड़क पर ऑटो की तलाश में खड़ा था. अब तक 14 ऑटो वाले उसे उसके घर की तरफ़ जाने वाले रास्ते पर ले जाने से इंकार कर चुके थे. क्यों? इसकी वजह उसे अब तक समझ में नहीं आई. तभी अचानक आसमान में सूरज को अपने आगोश में लेता बादल दिखाई दिया. इस बादल की शक्ल भी दूसरे बादलों की ही तरह थी लेकिन ये आम बादलों की तरह गरजने वाला नहीं सुनाई दिया.
राहुल ने ऊपर आसमान की तरफ़ देखा और बादल की आड़ में छुपे सूरज को निहारकर मुस्कुराया...मन ही मन बोला...खूब गर्मी उगल रहे थे न…आख़िर फंस ही गए बादल के चंगुल में. इतने में सामने से उसे 15वां ऑटो दिखाई दिया. दिल से उसे यही लग रहा था कि ये ऑटो भी बाक़ी ऑटो वालों की तरह मन-पसंद जगह की ही सवारियां ले जाना पसंद करेगा और उसके घर की तरफ जाने वाले रास्ते पर जाने से साफ़ मना कर देगा. लेकिन तभी उसे अपने दिमाग़ की भी आवाज़ सुनाई दी, कि भई हाथ दो क्या पता ये बाक़ियों से अलग हो. उसने इसे भी हाथ दिया...और ये ऑटो रुक गया. वो अंदर बैठा और ऑटो, सड़क पर उसे लेकर दौड़ने लगा. रास्ते पर जिस रफ़्तार से ऑटो दौड़ रहा था उसी रफ़्तार से उसके माथे पर फैली पसीने की बूंदें सूख रही थीं और उसके गर्म दिमाग़ को ठंडक मिल रही थी.
20 मिनट तक ड्राइवर ने एक्सीलेटर को उमेठे रखा और उसके बाद उसे ढीला छोड़कर ब्रेक लगाई. राहुल का घर आ चुका था. ऑटो वाले को पैसे देकर वो बिल्डिंग में दाखिल हुआ. और 2 मंज़िल सीढ़ियां चढ़ते हुए अपने किराए के फ़्लैट पर पहुंचा. घर पर उसका इंतजार करने वाला तो कोई था नहीं सो उसने चाबी निकाली और ख़ुद ही दरवाज़े का ताला खोला. घर के अंदर दाख़िल होते ही गर्मी का फिर वही आलम...सीढ़िया चढ़ने से माथे पर पसीने की धार बह रही थी. उसने फटाफट एसी चलाया और पंखे को उसकी औकात भर दौड़ने के लिए चालू कर दिया.
दिमाग़ को मौसम के मिजाज़ से उलट कुछ और दिखाने की फ़िराक़ में उसने टीवी ऑन किया और अपने पसंदीदा न्यूज़ चैनलों में मन रमाने की कोशिश करने लगा. ख़बरिया चैनलों पर सिर्फ़ और सिर्फ़ बाबा रामदेव छाए हुए थे जिन्होंने सियासी गलियों में सूरज से भी ज़्यादा गर्मी पैदा कर रखी थी. राहुल को यहां भी निराशा हाथ लगी. फिर उसने दूसरे विकल्प के तौर पर फ़िल्मी चैनलों का रुख़ किया.
यहां उसे 70 की दशक की फिल्म ‘अभिनेत्री’ का का गाना ‘ओ घटा सांवरी..थोड़ी थोड़ी बावरी..हो गई है बरसात क्या !’ दिखाई दिया. गाना देखते ही वो बारिश की कल्पना में खो गया. और जब वो खोया तो ऐसा खोया कि उसे पता ही नहीं चला कि कब नींद ने उसे अपनी बाहों में जकड़ लिया. नींद के आगोश में पहुंचते ही वो फास्ट लोकल पकड़कर स्वप्न लोक की सैर करने लगा. उसने देखा कि उसके घर के सामने ज़ोरदार बारिश हो रही है. इस बारिश में सभी भीग रहे हैं और महीनों से तपती धरती की प्यास बुझ रही है.
लेकिन सामने वाली बिल्डिंग के गेट के पास कोने पर लगा एक ठूंठ बारिश में उसे कुछ कुछ बदला-बदला लगा. उसने ठूंठ से पूछा कि क्यों भाई बारिश में आपको कुछ ज़्यादा ही मज़ा आ रहा है. उसने कहा हां जब पिछले साल मेरा तना गिरा था और बढ़ई मेरी सारी शाखाएं काट कर ले जा रहा था तब उसने कहा था कि तुम चिंता न करो बारिश में फिर से कोपलें फूटेंगी और तुम फिर हरे भरे हो जाओगे. बस इसी आस में 7 महीनों से सारे मौसम झेलते हुए इस दिन का इंतजार कर रहा था. आज पहली बारिश से मेरे अरमानों को वो ख़ुराक मिली है जो फिर से बरसों जीने का हौसला दे रही है.
ठूंठ की बात सुनकर जैसे ही वो चलने लगा...दूर से एक चिड़िया अपने भीगे पंखों को फड़फड़ाती बड़ी मुश्किल से उड़ान भरती हुई उनकी ओर आती दिखाई दी. राहुल ठहर गया. चिड़िया जैसे ही उनके पास पहुंची राहुल ने पूछा क्या हुए चिड़िया रानी...इतनी बारिश में आप यहां क्या कर रही हैं. वो बोली अपने आशियाने की बुकिंग करने आई हूं.
राहुल चौंका...आशियाना..कैसा आशियाना...ये तो इंसानों की बस्ती है..तुम यहां कहां रहोगी?
चिड़िया बोली इंडिया टीवी न्यूज़ चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज़ देखकर पता चला है कि यहां एक ठूंठ है और बारिश के बाद वो हरा-भरा हो जाएगा. उसी की एक डाल की बुकिंग कराना चाहती हूं..क्या आप बता सकते हैं कि वो ठूंठ कहां है?
राहुल ने ठूंठ की तरफ़ इशारा करते हुए कहा...ये रहा..लेकिन इसके हरा भरा होने में तो अभी काफ़ी समय लगेगा.
चिड़िया बोली कोई बात नहीं जितना भी समय लगेगा मैं इंतज़ार कर लूंगी लेकिन जगह तो पक्की हो जाएगी न.
इन दोनों की बातें सुनकर ठूंठ बोला. भई वो सब तो ठीक है लेकिन इस बात का क्या भरोसा कि जब मेरी शाखाएं बड़ी हो जाएंगी तब तुम उन पर अपना घर बनाओगी ही.
चिड़िया ने कहा ठूंठ भाई..ये चिड़िया की ज़ुबान है किसी इंसान की नहीं लेकिन फिर भी भरोसा नहीं है तो मैं उस जगह की कोई भी क़ीमत अभी से देने को तैयार हूं. क्योंकि जब से होश संभाला है इस शहर में पंछियों के आशियाने बर्बाद होते ही देखे हैं. बड़ी दूर से इस आस में आई हूं कि मेरा भी खुद का कोई घर होगा जिसमें अपने परिवार के साथ हंसी खुशी रह सकुंगी.
राहुल बोला हां हां ठूंठ भाई आप जो भी क़ीमत बोलेंगे अगर चिड़िया रानी को पसंदा आती है तो वो उसे चुकाने के बाद अपनी जगह पक्की कर लेंगी और जब आपके पास उनके आशियाने के लिए जगह हो तो आप उन्हें पज़ेशन दे देना.
ठूंठ ने कहा ठीक है 1000-1000 के 50 नोट लूंगा 10 अभी बाकी 40 पज़ेशन के टाइम पर. चिड़िया ने कहा ठीक है. उसने अपनी जेब से पैसे निकाले और ठूंठ को देकर उड़ चली.
उसके जाने के बाद राहुल ने ठूंठ से पूछा कि आपने चिड़िया के सामने हज़ार के नोट की ही शर्त क्यों रखी. उसने जवाब दिया जो बढ़ई मुझे काटने आया था उसने इस शर्त पर मुझे जड़ से नहीं काटा कि मैं उसे एक साल के भीतर 1000 रुपए के 10 नोट दूंगा. बस उसी वादे को निभाने के लिए मैंने ये शर्त रखी है. ये कहते हुए उसने मोबाइल निकाला बढ़ई का नंबर डायल किया.
कुछ ही देर में बढ़ई अपने 3 साथियों के साथ मर्सिडीज में हाज़िर हुआ. और पैसे लेकर वापस कार में घुस गया. कार के शीशे से जो नज़ारा दिखा वो कुछ यूं था...10 में से 3 नोट बढ़ई ने अपनी जेब में रखे और 3 अपने साथ बैठे खाखी शर्ट पहने आदमी की जेब में डाल दिए. आगे की सीट पर सफेद कुर्ता पैजामा पहने आदमी को भी 3 नोट दिए और बचा 1 नोट को ड्राइवर की जेब में डाल कर वहां से रवाना हो गया.
उसके जाते ही ठूंठ के फोन की घंटी बजी और किसी ने फिर से आशियाने के बारे में पूछताछ की. ये क्रम भरी बारिश में घंटो चलता रहा और दूर-दूर से पंछी आते रहे और ठूंठ को पेशगी देते रहे.
अचानक खिड़की के ज़ोर से खटकने की आवाज़ आई और राहुल की नींद खुल गई. आंख खुलते ही सबसे पहले टीवी की तरफ देखा तो उसे वहां तकनीकी खराबी का संदेश दिखाई दिया...दूसरे...तीसरे सभी चैलनों पर यही संदेश रहा और कोई भी चैनल तस्वीरें नहीं दिखा रहा था. उसे लगा कि ज़रूर जोर की बारिश होने वाली है. क्योंकि ऐसे संदेश तभी आते हैं जब आसमान में घने बादल होते हैं और उसका डीटीएच एंटेना सैटेलाइस से आ रहे सिग्नल पकड़ने में नाकाम हो जाता है.
ख़ैर टीवी बंद कर वो बेडरूम से हॉल में आया और यहां आते देखा कि बाहर जोर की आंधी चल रही थी और आसमान में काले बादल ही बादल नज़र आ रहे थे. उसने खिड़की का दरवाजा खोल दिया. दरवाज़ा खोलते ही बारिश की पहली बूंद उसके गाल पर पड़ी और कुछ ही मिनटों के भीतर बादल बरसने लगे.
बरसते बादलों के बीच राहुल की आंखें उस ठूंठ को खोज रही थीं जिसने चिड़िया को आशियाना देने का वादा किया था. जल्द ही उसकी तलाश पूरी हो गई और वो उसे सामने वाली बिल्डिंग के पास नज़र आ गया. उसे देखकर राहुल की आंखें भी गीली हो गईं. मन ही मन वो बुदबुदाया...काश उसे ये एहसास पहले हो गया होता तो उस ठूंठ को सींच सींच कर वो कब का हरा बना चुका होगा. लेकिन अब शायद इस पश्चाताप का कोई फायदा नहीं.
फिर राहुल ने अपने ब्लैकबेरी मोबाइल से अपने इलाके की सोसायटी के सेक्रेटरी को रविवार को सभी सदस्यों की मीटिंग बुलाने का संदेश भेजा. रविवार को जब सोसायटी के सभी सदस्यों के बीच राहुल ने अपने उस सपने का ज़िक्र किया. चिड़िया की उस कहानी ने सभी का हृदय परिवर्तन तो नहीं किया लेकिन उनमें से कुछ ने उस इलाक़े में पेड़ लगाने और उनकी देख-रेख की बात ज़रूर की. और उसी शाम उस ठूंठ के आस-पास कई छोटे-छोटे पौधे लगे दिखे और उन पौधों के आस पास मंडराती चूं-चूं करती चिड़िया भी नज़र आने लगी.


