Thursday, April 10, 2014

भ्रम और लालच के बीच फंसे जीवन का द्वंद

जनतंत्र के बाज़ार की दुकानें बड़ी हसीन हैं
गलियों में गए तो लगा यहां आने की सज़ा पाई है
एहसास हुआ कि इधर कुंआ तो उधर खाई है
और उसमें गिरना ही पड़ेगा ये भी इक सच्चाई है

जब बदलने चले हम मुस्तक़बिल अपना
लगा बिल्कुल नई सुबह आई है
कुछ पहल ठहर के...उबलती लहर पे क़ाबू पाया
तब जा के पर्दा उठा, लगा कुछ और सच्चाई है

बदलाव की आंधी में सवार घर से निकले हम
एहसास में खुशबू थी कि जम्हूरियत से आशनाई है
लेकिन अगले चौराहे पर ही भ्रम टूटा
लगा जिससे दिल लगाया था उसने की बेवफ़ाई है

पर आख़िर ये दिल भी बेचारा क्या करे
उस पर मुश्किल ही ऐसी आई है
अनदेखे, अनजाने, अनसुने, चमकीले सपनों के
पूरा होने की आस में जीभ फिर ललचाई है !!!

सौरभ शुक्ल
10/04/2014

Saturday, December 7, 2013

वो नहीं सहेगी गंदी बात !!

चर्चा-ए-आम है...हर दफ़्तर में चुपचाप ढिंढोरा पिटवा दिया गया है...अब महिलाओं को नौकरी पर नहीं रखा जाएगा!

ये सुनते ही तकरीबन 3 साल पहले देश के नंबर 1 चैनल के एक HR मैनेजर की वो बात मेरे ज़हन में ताज़ा हो गई. उसने मुझसे कहा कि भई कुछ फ्रेशर्स की ज़रूरत है चैनल में, कोई नज़र में हो तो बताना.

मैनें कहा ठीक है....मैं CV भिजवाता हूं आपको.

तभी उसने नौकरी के लिए एक अहम अनिवार्यता बताई, कहा लड़कियों के ही CV भेजना...बॉस का साफ़ कहना है कि न्यूज़रूम में सिर्फ लड़कियां ही रहनी चाहिए.

मैंने चौंकते हुए पूछा..क्यों भई? लड़कों ने क्या गुनाह किया है?

जवाब मिला, “बॉस कहते हैं कि लड़कियां न्यूज़ रूम में रहती हैं तो शोर कम होता है, वो झगड़ती भी कम हैं और उनके रहने से दिल भी लगा रहता है”.

इस तर्क के पीछे की वजह तब तो समझ में नहीं आई थी लेकिन अब, जब एक बड़े सम्पादक गोवा के लॉकअप में रिमांड पर हैं, उस बात से धुंध काफी हद तक हट चुकी है.

आश्चर्य इस बात पर है कि उस समय ज़रा भी एहसास नहीं था कि महिलाओं के प्रति ऐसी सोच रखने वाले पुरुषों का टेस्ट महज़ 3 साल में इतना बदल जाएगा कि वो उन्हें नौकरी देने में ख़ौफ खाने लगेंगे.

लेकिन जनाब आपको नारियों से आख़िर डर लगता क्यों हैं? क्या आपको ये डर है कि अबतक जो गुनाह आपने किए हैं उन सबसे पर्दा हट जाएगा. क्या आपको ये डर है कि महिलाओं के इर्द गिर्द होने से आप अपने आप पर क़ाबू नहीं रख पाएंगे. तो माननीय महोदय ये एक बीमार मानसिकता है और आप अपना ईलाज किसी डॉक्टर...हकीम या वैद्य से कराएं. समाज को ‘आधी आबादी’ के प्रति अपनी इस सोच से मुक्त रखें.

ये समाज जितना पुरुष का है उतना ही स्त्री का भी है लेकिन कुछ रसूख़दार पुरुषों की वो जमात जो अपने आपको स्वयंभू नीति निर्माता मानने लगे हैं...वो चाहते हैं कि मैं तुम्हें चाहे जितना सताऊं लेकिन तुम जब तक बुत बनी रहोगी तभी तक ठीक है नहीं तो हम अपने बीच तुम्हें नहीं रहने देंगे. दुनियाभर में तुम्हारी ऐसी छवि बनाएंगे कि लोग तुम्हारा प्रतिकार करेंगे. हम ये कहने लगेंगे कि हमें तुमसे डर लगता है.

ऐसे आचरण से एक बात फिर साबित हो जाती है कि पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं के लिए जगह तभी तक है जब तक वो गूंगी गुड़िया बनी सब कुछ चुपचाप सहती रहे. चाहे नारी कितनी भी सबल हो इस बीमार मानसिकता वाले समाज के मुखिया चाहते हैं वो निर्बल बनी हर ज़ुल्म का घूंट बिना आवाज़ निकाले पीती रहे. और जब नारी ने इसका प्रतिकार किया है तो इन्होंने नारियों को अपने बीच न रखने का फैसला किया है.

गंदी मानसिकता वाले पुरुषों ने नारी को अपने मनोरंजन का साधान बना रखा है. वो चाहते हैं कि उनके इर्द गिर्द इनका जमावड़ा लगा रहे. पुरुष जो चाहे नारी वही करे...कभी भी उसका विरोध न करे. पुरुष कभी भी, कहीं भी, कोई भी, कैसी भी हरकत करे लेकिन नारी प्रतिरोध न करे.

और ये बात आज की नहीं है युगों से नारी को इसी के काबिल माना जाता रहा है...बाबा तुलसी ने भी रामचरित मानस में लिखा है, “ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी” यानि नारी को कहीं भी चैन नहीं रहा है. लेकिन अब नारी के मुंह से उफ़्फ़ निकली है. पुरुष ने अपनी सारी हदें पार कर दी हैं और नारी की सहनशक्ति भी जवाब दे गई है.

वो कहते हैं न कि नारी का 1 रूप ज्वाला भी होता है और जिस तरह ज्वालामुखी को फूटने से नहीं रोका जा सकता है, नारी को भी ज़ुल्म-ओ-सितम के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने से पुरुष प्रधान समाज नहीं रोक पाया है...फिर चाहे इसे आवाज़ को रोकने..दबाने वाले संत हों, सम्पादक हों या फिर न्यायमूर्ति.

दरअसल 16 दिसंबर की शिकार,  दामिनी को खोने के बाद इस देश में एक दिया जला था. और उस दिये की ज्योति ने सताई हुई नारी जाति को नई रौशनी दी जो अब ज्वालामुखी बन चुकी है...उसने ठान लिया है कि अब वो समाज को बदल कर ही दम लेगी.

तो परम पूज्य बापूजी...आदरणीय सम्पादक महोदय...माननीय नेताजी...श्रद्धेय जज साहेब...वगैरह वगैरह...आपने नारी जाति पर बहुत अत्याचार किए हैं लेकिन अब सुधर जाइए. अब और अत्याचार मत करिए क्योंकि नारी ने अब ठान लिया है कि अगर वो सुंदरता की प्रतिमा है तो वक़्त आने पर चंडिका भी बन सकती है और अब आपकी एक ग़लती आपको अपनी औक़ात बता देगी.

शास्त्रों में भी लिखा है कि कर्मों का फल इसी जन्म में मिलता है. अब जब बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय? स्त्री से अब डरने का कोई फायदा नहीं है जो भी कुकर्म जिसने भी किए हैं उसका फल मिलकर ही रहेगा! क्योंकि नारी ने अब ये प्रण किया है कि अब वो नहीं रुकेगी...नहीं सहेगी...नहीं रहेगी पहले जैसी और समाज के इन स्वयंभू ठेकेदारों को नारी के इसी प्रण से डर लगता है.

सौरभ शुक्ल
7 दिसंबर, 2013

Wednesday, August 14, 2013

जब मोर संसद आया..

जंगल में मोर नाचा किसने देखा ?? ये सुन सुनकर इस मोर के कान पक गए और वो आज बड़ी उम्मीद के साथ अपना नाच दिखाने देश की सबसे बड़ी पंचायत यानि संसद में पहुंचा...उसे लगा कि यहां बहुत मीडिया वाले होते हैं तो उसके नृत्य को बढ़िया कवरेज भी मिल जाएगी.

लेकिन संसद पहुंचकर उसकी उम्मीदों का पिटारा मायूसी के टोकरे में तब्दील हो गया...संसद में उसने जो देखा उससे वो दंग रह गया...वहां तो उससे भी बड़े डिस्कोडांसर थे...कांग्रेस फूड बिल के लिए नाच रही थी..बीजेपी वाड्रा के नाम पर नाच रही थी...लेफ्ट कह रहा था कि नाच तो वो भी लेंगे लेकिन अभी इकोनॉमी के हालात अच्छे नहीं हैं...ये सरकार उनके नाचने लायक माहौल नहीं बना पा रही है...मोदी ने गुजरात से ठुमका लगाया लेकिन उसका असर संसद तक दिखा कि हम फूड बिल पर तब नाचेंगे जब आप सारे राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाओगे...मायावती कह रही थीं कि पहले जम्मू और कश्मीर और उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाओ हम तभी ठुमका लगाएंगे...इतने में आवाज़ आई SAVE ANDHRA PRADESH और साक्षात रजनीकांत स्टाइल में TDP और आध्र समर्थक कांग्रेस सांसदों का नृत्य चालू हो जाता है...और सारे कैमरे इन महानृत्यों के चारो तरफ नाच रहे हैं.

इतना सब देखकर मोर के सब्र का बांध टूट गया और उसने वापस घर की तरफ उड़ान भरी..उसकी उदास सी शक्ल देखकर मोरनी ने पूछा कि क्या हुआ किसने-किसने तुम्हारा नाच देखा...मोर ने उदास होकर कहा कि वहां सब अपने नाच में ही इतने मगन थे कि उसकी तरफ किसी ने आंख उठाकर देखा तक नहीं...मोरनी ये सुनकर एकदम सन्न हो गई लेकिन तभी बोल पड़ी... तो क्या हुआ...मैं हूं न... मुझे तुम्हारा नाच देखना है...ये सुनकर उदास मोर की सारी उदासी रफूचक्कर हो गई और उसने पंख फैलाकर नाचना शुरू कर दिया!!



Sunday, March 17, 2013

गंदा है पर धंधा है ये!!!

देश के तीन बड़े प्राइवेट बैंकों पर किए गए स्टिंग ऑपरेशन ने बैंकिंग सिस्टम पर कई सवालिया निशान लगा दिए हैं. लेकिन क्या इस ऑपरेशन के बाद भी यहां किसी तरह के सुधार की उम्मीद की जा सकती है या फिर ये ख़बर भी बाक़ी ख़बरों की तरह धूल चाटती नज़र आएगी इसका कोई नतीजा नहीं निकलेगा...ये एक बड़ा सवाल है जो मुझे ख़ासा परेशान कर रहा है. और उससे भी बड़ा सवाल कि आख़िर कौन हैं इस गोरखधंधे के पीछे के असली विलेन?



कोबरा पोस्ट ने रेड स्पाइडर के नाम से एक स्टिंग ऑपरेशन किया...ICICI बैंक...HDFC बैंक और AXIS बैंक को उसने अपने रडार पर रखा...6 घंटे से ज़्यादा की फुटेज में तीनो बैंकों के दर्जनों कर्मचारियों को काला धन सफेद करने के नुस्ख़े बताते दिखाया...बड़े बड़े चैनलों ने शुरुआत में तो इस ऑपरेशन को कोई तवज्जो नहीं दी लेकिन बाद में ख़बर दिखाई और कुछ ने उस पर चर्चा भी की. चर्चा में बड़े बड़े ज्ञानी लोगों ने कहा इसमें कुछ भी नया नहीं है ये तो सालों से होता आया है और सरकार को इसपर लगाम लगानी चाहिए.

स्टिंग ऑपरेशन दिखाए जाने के तुरंत बाद तीनो बैंकों ने बड़ी ज़िम्मेदारी से इस पर प्रतिक्रिया दी और कहा कि वो इस मामले की तुरंत जांच करेंगे और दोषियों के ख़िलाफ सख़्त कार्रवाई की जाएगी. रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने अपना कर्तव्य निभाते हुए बैंकों को नोटिस भेजा और मामले की जानकारी मांगी. वित्तमंत्री चिदंबरम ने बार बार पूछने पर रटा रटाया बयान दिया कि बैंक मामले की जांच कर रहे हैं.

अगले दिन से ऑपरेशन रेड स्पाइडर की प्रतिक्रिया दिखनी शुरू हो गई...देर शाम ICICI बैंक ने 18 लोगों को सस्पेंड किया. उसके अगले दिन यानि शनिवार को एक्सिस बैंक ने अपने 18 कर्मचारियों को ग्राउंडेड कर दिया. यानि वो जांच का काम खत्म होने तक बैंकिंग का काम नहीं कर सकेंगे. जब HDFC बैंक से उनके एक्शन के बारे में पूछा तो जवाब मिला कि हम मामले की बड़ी गंभीरता से जांच कर रहे हैं और उचित समय आने पर बता देंगे कि हमने क्या एक्शन लिया है.

देश के लिए न तो भ्रष्टाचार नया है...न ही ये तरीका. और न ही देश के लिए स्टिंग ऑपरेशन नए हैं. ये मामला अभी सामने आया है फिर 4 दिन के शोर शराबे के बाद ये भी कहीं गर्त में समा जाएगा और इस पूरी फ़िल्म के असली विलेन कभी सामने नहीं आ पाएंगे. जी हां असली विलेन...ये असली विलेन वो लोग हैं जो बैंकों के हेड ऑफ़िस में बैठे हुक्म चलाते हैं यानि बैंक के सबसे बड़े कर्ताधर्ता.

इन लोगों का सिर्फ एक ही एजेंडा होता है कि अपने बैंक को सबसे बड़ा बनाना...बैंक चाहे लोन बांट रहा हो या फिर कोई इंश्योरेंस पॉलिसी बेच रहा हो या फिर कोई म्युचुअल फंड की स्कीम हो, देश का हर नागरिक इनके प्लान में निवेश करे. इसके लिए ये देश भर में अपने दफ्तर खोलते हैं और उन दफ्तरों को चलाने के लिए मैनेजर रखते हैं. मैनेजर के नीचे एक बड़ी टीम होती है जो बैंक को बड़ा बनाने...उसके प्रोडक्ट बेचने के काम में दिन रात लगी रहती है. यहां बैंक हेड का डंडा ब्रांच मैनेजर पर पड़ता है और वो उस डंडे को अपने टीम पर चलाता है ताकि बैंक में रुपयों की बाढ़ आती रहे.

इन लोगों को एक लक्ष्य दिया जाता है कि भई रमेश दुबे को इस महीने में 25 लाख का बिज़नेस देना है और पूरे दफ्तर से या कहें ब्रांच से 25 करोड़ का बिज़नेस होना ही है किसी भी क़ीमत पर. इसी जद्दोज़हद में जो टीम मेंबर सफल हो गया उसे शाबाशी और जो असफल हो गए उन्हें गालियां मिलती हैं. और जो इससे भी एक क़दम आगे बढ़ जाता है यानि 25 लाख की जगह 50 लाख का बिज़नेस ले आया तो उसे प्रमोशन और इंसेंटिव भी मिलता है. ये फ़ायदा हर स्तर पर मिलता है चाहे एक टीम मेंबर हो या फिर पूरी ब्रांच का मैनेजर.

यहीं से शुरुआत होती है इस पूरे गोरखधंधे की. जब काम का दबाव या कहें टार्गेट पूरा करने का दबाव लोगों पर बढ़ता है तो ऐसे में वो दबाव से पीछा छुड़ाने के लिए ग़ैर क़ानूनी काम करने की तरफ पहला क़दम उठाते हैं...उस कदम को ब्रांच मैनेजर का भी सपोर्ट मिलता है क्योंकि इससे ब्रांच मैनेजर के भी टार्गेट का बोझ कम होता है और उसे इंसेंटिव का सुहाना सपना दिखना शुरु हो जाता है...पैसा आता देख बैंकों के हेड भी चुपचाप बस माल अंदर करने मे झट से लग जाते हैं.

इस सारे काले कारोबार में मददगार होता है देश के अंदर मौजूद काला धन. अब बैंकों के मुंह में एक बार तो ख़ून लग ही चुका है नियम तोड़ने का, ऐसे में उन्हें इस काले धन को सफेद करने में जबर्दस्त मुनाफ़ा दिखता है और बैंकों के कर्मचारी जितना बिज़नेस 6-8 महीने में करते थे उन्हें एक झटके में ही मिलने लगता है.

इसी गोरखधंधे को कोबरापोस्ट के स्पाइडर ने अपने बाहुपाश में जकड़ने की कोशिश की है. इस स्टिंग ऑपरेशन की ज़द में वो लोग आए जो बेचारे बस अपने बॉस का हुक्म मान रहे थे. यहां मैं इनकी तरफ़दारी नहीं कर रहा हूं कि इन्होंने जो किया वो सही किया है... बस इतना कहना चाहुंगा कि इनकी ग़लती में बैंक के बड़े अधिकरी यहां तक कि बैंक के चेयरमैन और मैनेजमेंट के लोग भी उतने ही ज़िम्मेदार हैं जो इस स्टिंग ऑपरेशन के दायरे में नहीं आ पाए हैं. और सही मायने में इस कहानी के अगर कोई विलेन हैं तो वो लोग ही हैं. ऐसे में जो सज़ा स्टिंग ऑपरेशन में दिखाए गए चेहरों को मिलनी चाहिए उससे कहीं बड़ी सज़ा बैंक के मैनेजमेंट को मिलनी चाहिए क्योंकि बड़ा गुनाह उन्होंने किया है.

अगर हमें बैंकिंग सिस्टम को सुधारना है तो सबसे पहले प्राइवेट सेक्टर बैंकों के कामकाज़ का तरीक़ा बदलना होगा. रिज़र्व बैंक को मौजूदा नियमों को सख़्ती से लागू करवाने के साथ साथ इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि कहीं जाने अनजाने बैंक अपने कर्मचारियों पर जबर्दस्ती का टार्गेट तो नहीं लाद रहा है. क्योंकि जब आप बेईमानी का प्रेशर डालेंगे तब ईमानदारी के बिज़नेस की उम्मीद ज़रा कम ही रहती है. उम्मीद है कि रेड स्पाइडर स्टिंग ऑपरेशन के बाद बैंकों के कर्ताधर्ता कुछ सोचेंगे और कामकाज के तरीके को बदलेंगे...नहीं तो ये धंधा ऐसे ही चलता आया है और आगे भी ऐसे ही चलता रहेगा।।। 


Sunday, July 29, 2012

अन्ना का ये अनशन कब तक?


दिल्ली के जंतर-मंतर पर मज़बूत लोकपाल की मांग करने के लिए फिर से किशन बाबूराव हज़ारे यानि अन्ना हज़ारे गए हैंफिर से अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया और कुमार विश्वास भी हैंफिर से मीडिया के कैमरे भी मौजूद हैं. पूरा स्टेज सजा है लेकिन सबके मन में सवाल ये है कि इस बार भीड़ क्यों नहीं है?



इस बार और भी कई चीज़ें अलग हैं. पिछली बार केवल अन्ना अनशन पर बैठे थे और लोग मैं भी अन्ना - तू भी अन्नाके नारे के साथ उस आंदोलन का समर्थन में कूद पड़े थे लेकिन इस बार पहले अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया और गोपाल राय अनशन पर बैठे और 4 दिन के बाद आज से अन्ना भी अनशन पर बैठे हैं तब भी लोग किसी तरह का समर्थन नहीं दे पा रहे हैं.

पिछली बार एक सुर में लगातार मांग सिर्फ़ ये थी कि मज़बूत लोकपाल आए जिससे भ्रष्टाचार खत्म हो. इस बार मांग 15 केंद्रीय मंत्रियों को जांच की है लोकपाल का सुर केवल अन्ना के ही कंठ से सुनाई दे रहा है वो भी रह रह कर.

अन्ना के उस अनशन में मीडिया दिन रात सारी ख़बरों को ताक पर रखकर अन्ना मय हो गई थी लेकिन इस बार वहां भीड़ होने की ख़बर दिखाने पर उसे मार भी खानी पड़ रही है. यानि टीम अन्ना अब उस मोड़ पर पहुंच चुकी है जहां आलोचना उसे ज़रा भी बर्दाश्त नहीं है.

पिछली बार से एक क़दम आगे जाते हुए अन्ना समर्थकों ने इस बार शांति को तार-तार करते हुए देश के प्रधानमंत्री के घर 7 RCR पर हल्ला भी बोला. उन्हें चोर कहां और टीम की तरफ से लगाए गए आरोपों के नारे लगाए. टीम अन्ना की भीड़ का गुस्सा यहीं नहीं थमा उसने प्रधानमंत्री के घर पर कोयले और सिक्के भी फेकें.

जब नौबत यहां तक गई तब दिल्ली पुलिस ने इन लोगों को गिरफ़्तार भी कर लिया. यानि अन्ना की जो टीम अब तक अहिंसावादी थी...सांसदों के घरों के आगे विरोध प्रदर्शन तक सीमित थी अब प्रधानमंत्री के घर तक पहुंच गई है और ये संकेत भी मिलने लगे हैं कि वो हिंसा से भी नहीं हिचकिचाएगी.

ऐसे में जहां हर शख़्स तरह-तरह के सावलों में डूबा है, जाने माने समाज सेवी और कभी अन्ना के साथ आंदोलनों में शामिल रहे कुमार सप्तर्षि को आंदोलन के इस हाल पर बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं हो रहा है. सप्तर्षि का कहना है कि मैं अन्ना को अच्छी तरह से जानता हूं. अन्ना के लिए सत्याग्रह एक इवेंट मैनेजमेंट है और ये अनशन, महज अन्ना ब्रांड का प्रमोशन भर हो कर रह गया है.  

सप्तर्षि के मुताबिक अन्ना के लिए सत्याग्रह, सत्य की खोज और विरोधियो पर विजय पाने का हथियार नहीं है बल्कि ये एक ऐसा अस्त्र मात्र बन गया है जो उन्हें हर मोर्चे पर योद्धा साबित करता रहे. योद्धा भी केवल उन दुश्मनों के सामने जो उन्होंने खुद चुने हैं.

अन्ना की जिंदगी की फ़िक्र करने वालों के बारे में सप्तर्षि कहते हैं कि वो अनशन से कभी नहीं मरेंगे. वो कहते हैं कि अन्ना अपने युद्ध को जारी रखने के लिए हमेशा एक नए प्लेटफॉर्म की तलाश में रहते हैं. यहीं नहीं सप्तर्षि के मुताबिक जब अन्ना को इस बात का एहसास हो जाएगा कि उनका आंदोलन केजरीवाल जैसे लोगों के बस से बाहर है तो वो स्वामी रामदेव का दामन थाम लेंगे.

अन्ना के इस पुराने साथी की बातों का माने या माने लेकिन जिस तरह से पिछले करीब डेढ़ साल से अनशन की लहर पहले चढ़ती और फिर गिरकर खत्म होती रही है उससे लोगों में इस आंदोलन को लेकर दुराव की भावना ज़रूर पनपी है. लेकिन अभी भी समाज का एक बड़ा तबका ऐसा है जो इस बात का समर्थक है कि एक बूढ़ा आदमी देश की तस्वीर बदलने के लिए भूखा मर रहा है ऐसे में उस पर शक कैसे किया जा सकता है?

सप्तर्षि की बातें कितनी सच्ची या झूठी हैं ये तो वक़्त बताएगा लेकिन जिस तरह से पहले अन्ना के आंदोलन में खुले आम स्वामी रामदेव की घुसपैठ शुरू हुई, फिर स्वामी रामदेव के 4 जून के एक दिन के अनशन में अन्ना का शामिल होना और अब स्वामी रामदेव की बढ़ती ताक़त इस बात पर ज़रूर सवालिया निशान लगाती है कि आख़िर अन्ना का इस बार का अनशन कब तक चलेगा और किस तरह से चलेगा?

Saturday, December 31, 2011

कैलेंडर बदल गया











कैलेंडर बदल गया कि नया साल आया है

उम्मीदों का नया पिटारा लाया है

क्या रहा अधूरा पिछले साल में

ये रहा किसे अब याद

आगे जो हो सब अच्छा हो

सब डूबे इस फरियाद में


क्योंकि


कैलेंडर बदल गया कि नया साल आया है

उम्मीदों का नया पिटारा लाया है

मैंने भी मांगा है इस साल से

कि हो कुछ नया नवेला

मनमोहन का टूटे मौन

भ्रष्टाचार मुक्त हो नया सवेरा


क्योंकि


कैलेंडर बदल गया कि नया साल आया है

उम्मीदों का नया पिटारा लाया है

सबके घर में हो खाने को रोटी

बहन मायावती हों अब और न मोटी

जो हुआ न हो पूरा पिछले साल में

वो रहे न अधूरा अबकी साल में


क्योंकि


कैलेंडर बदल गया कि नया साल आया है

उम्मीदों का नया पिटारा लाया है !!!






Friday, December 30, 2011

अदबी इदारों में दम घुटता था जिसका, चला गया

साल 2011 आख़िरी पड़ाव पर है लेकिन जाते जाते यह अपने साथ धरती के अनमोल नगीनों को भी लेता जा रहा है. आज काल का शिकार बने आम आदमी के कवि अदम गोंडवी या कहें रमानाथ सिंह. उन्हें लीवर से जुड़ी तकलीफ़ थी. लखनऊ के पीजीआई अस्पताल में आज तड़के साढ़े 5 बजे उन्होंने आख़िरी सांस ली और अपने पीछे छोड़ गए अमिट छाप वाली रचनाएं.

अपने ठेठ और गंवई अंदाज़ के लिए मशहूर अदम साहब का जन्म 22 अक्टूबर 1947 को उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले में पसरपर के आटा गांव में हुआ था. ये गांव गोस्वामी तुलसीदास के गुरु स्थान सूकर क्षेत्र के बेहद करीब है. स्वर्गीय श्रीमती मांडवी सिंह और श्री देवी कलि सिंह के पुत्र अदम कबीर परंपरा के कवि थे. बस कहीं फ़र्क है तो वो ये कि कबीर जी ने कभी कागज़ कलम नहीं छुआ और इन्होंने उसे छुआ था. लेकिन बस उतना ही जितना एक किसान ठाकुर के लिए ज़रूरी होता है.

आज़ादी के ठीक बाद की पैदाइश का असर उनके आज़ाद ख़्यालों में साफ नज़र आता था. तभी तो वह कहते हैं...

देखना सुनना व सच कहना जिन्हें भाता नहीं
कुर्सियों पर फिर वही बापू के बंदर आ गए.
कल तलक जो हाशिये पर भी न आते थे नज़र
आजकल बाजार में उनके कलेंडर आ गए.


वो ज़मीन से किस तरह जुड़े हुए शख़्स रहे हैं इसका एक नज़ारा उनकी इस कविता से मिलता है...

पूरा लेख पढ़ें...

Tuesday, July 12, 2011

अफ़साना

इक रात बैठा मैं भी
लिखने इक अफ़साना
किसी को बनाने लगा परी
और खुद को उसका दीवाना

फिर याद आई इक दोस्त की कहानी
और याद आई वो परियों जैसी रानी
दोनों इक देश में रहते थे
प्यार में जीते मरते थे

परी हंसती खेलती थी
नूर हर जगह करती थी

इक दिन इक ज़ालिम ने
उस परी का दिल तोड़ दिया
उस दिन से उस परी ने
ज़िंदगी से मुंह मोड़ लिया

शहज़ादा उसकी हालत पर परेशान हो रोने लगा
उसके पास बैठकर फरियाद उससे करने लगा

रोता उसे परी देख न सकी
उठकर शहज़ादे के वो सीने से लगी
तुमको छोड़के न जाउंगी
मैं तुम्हारा साथ निभाउंगी

दिन खुशियों में गुज़रते गए
रातें यूं ही कटती गईं
इक दिन परी को वापस अपने देश जाना पड़ा
शहज़ादे को तन्हा छोड़ के दूर उससे होना पड़ा

जब भी बहार का मौसम आता था
वो फिर से एक होते थे
प्यार की बातें करते थे
प्यार में जीते मरते थे

ज़ालिम रूप बदल के
इक दिन फिर सामने आया
अब उसने शहज़ादे को प्यार से भटकाया

शङज़ादा भी कहां कम था
उसने उल्टा चक्कर चलाया
ज़ालिम को भी प्यार का एहसास दिलाया
ज़ालिम का ग़ुरूर तोड़ दिया फिर मुंह उससे मोड़ लिया

ऊपर वाले को शहज़ादे की ये बात पसंद न आई
और शहज़ादे को दर्द भरी सज़ा दिलाई
परी को मौत की कश्मकश में डाल दिया
पर परी ने ज़िंदगी देने से इनकार किया

कहा मुंझे दो पल शहज़ादे के पास जाने दो
उसका चेहरा देखने दो उससे बात करने दो

परी की मासूमियत देखकर
मौत को भी उसपर तरस आया
पर फिर मौत को ख़ुदा का हुक़्म याद आया

परी ने अपनी जान को मौत के हवाले किया
पर आख़िरी पैग़ाम मोहब्बत का
शहज़ादे के नाम किया

तुम ज़िंदगी जीना मत छोड़ना
तुम दिल किसी का न तोड़ना
मैं हर पल तुम्हारे साथ हूं
तुम हंसना हंसाना मत छोड़ना

अब शहज़ादा जीता है
और प्यार की बातें करता है
खुद भी हंसता रहता है
दूसरों को भी हंसाता रहता है
इस गम को दिल में दबाकर भी
वो जीता है

तो अब तुम ही बताओ
इसमें शहज़ादे का है गुनाह क्या
जो ज़ालिम का दिल तोड़ दिया
तो उसने था क्या बुरा किया

Saturday, June 25, 2011

कलावती की चिट्ठी

आदरणीय राहुल गांधीजी,

मेरा नाम कलावती है...मैं वो विदर्भ वाली कलावती नहीं जिसका ज़िक्र आपने संसद में किया था. न ही उनमें से कोई जिनके घर लालटेन की रोशनी में आपने निवाले खाए थे. मैं देश के हर गांव में रहने वाली कलावती हूं जिसके उजाले में रहने के अधिकार पर कल आपकी पार्टी वाली सरकार ने कटौती कर दी है.

कल शाम तो मेरी आम शाम जैसी ही रही लेकिन आज की सिर्फ़ शाम ही नहीं रात भी अंधेरी है. आज सुबह जब से पता चला कि आपकी सरकार ने मिट्टी के तेल के दाम बढ़ा दिए हैं उसके बाद से मेरे दिलो दिमाग़ पर तो अंधेरा छाया ही था अब मेरे घर में भी अंधेरा छाया है.

आपकी सरकार तो मिट्टी का तेल 2 रु ही महंगा करके देश के ऊपर एहसान करने का दावा कर रही है लेकिन असल में इन 2 रुपयों से घर में 3 दिन की रोशनी होती थी. अब ये 3 दिन घर में अंधेरे में बिताने की चिंता सता रही है.

तीन साल से पैसे जोड़ कर रखे थे कि सिलेंडर-चूल्हा खरीदुंगी क्योंकि मेरी बेटी मुन्नी जब भी चूल्हे में खाना बनाती है उसकी आंखों में आंसू आ जाते हैं. लेकिन जब पिछले साल मिट्टी के तेल के दाम बढ़े थे तब से हिम्मत गैस खरीदने की हिम्मत जवाब देती जा रही है.

1 जुलाई को उसका जन्मदिन है और उसके पिता उस दिन उसे यही तोहफ़ा देना की हिम्मत फिर से जुटा रहे थे और इसके लिए कर्जा लेने के बारे में भी सोच रहे थे लेकिन अब तो उनका भी माथा चकरा रहा है क्योंकि आपने मिट्टी के तेल के साथ साथ गैस भी तो महंगी कर दी है.

समझ में नहीं आ रहा है कि अब क्या करूं. मुन्नी के बापू बता रहे थे कि आपने डीजल भी महंगा करवा दिया है तब तो बस, टैम्पो का किराय भी बढ़ जाएगा. अब शहर जाने के लिए भी ज्यादा पैसे देने पड़ेंगे. और तो और दाल, चावल, नमक सब महंगा हो जाएगा. इतने पैसे आएंगे कहां से ये भी आपने सोचा है कभी.

हमेशा हमारा नाम इस्तेमाल करके आप आपनी छवि तो रिन की सफेदी से ज्यादा चमकदार बना लेते हैं लेकिन क्या इसके बदले में हमारा अंधेरा दूर करना आपका दयित्व नहीं है.

अब मेरी ही मति मारी गई है जो आप से उम्मीद लगाए बैठी हूं कि आप मेरे घर में उजियारा लाएंगे. अरे आप तो जो उजाला है उसमें भी बट्टा लगाते जा रहे हैं. वैसे भी आप मेरे घर में उजाला क्यों करेंगे भला. आपके घर में तो चिमनी जलती नहीं होगी...न ही आपको पैसे खर्च करने पड़ते हैं इसके लिए. आप तो राजयोग लेकर पैदा हुए हैं न.

जब आपने कलावाती का नाम संसद में लिया था तब मैं भी अपने आपको धन्य महसूस कर रही थी कि कम से कम एक आप तो हैं जिन्हें भारत के दूर दराज़ गावों में रहने वालों की फ़िक्र है और जो उनका ज़िक्र भी करते हैं लेकिन आज मैं अपने आप को ठगा सा महसूस कर रही हूं. ऐसा लग रहा है मानो आपकी पार्टी को वोट देकर हमने ग़लती की है.

ख़ैर जो हुआ सो हुआ और इसे सुधारने या बदलने के लिए तो अभी 2 साल 11 महीनों तक का और इंतजार करना पड़ेगा. इस बीच आप जितना अंधेरा करना चाहें कर सकते हैं क्योंकि हमने आपको आपको ये करने का अधिकार दिया है. हम असहाय हैं इसका आप जितना भी फ़ायदा उठाना चाहें उठा सकते हैं. लेकिन ये आप भी जानते होंगे कि ये ग़लत हैं..धोखा है और इसकी उम्मीद हमें आपसे बिल्कुल भी नहीं थी.

पता नहीं आप मुझे अपना मानते हैं या नहीं लेकिन फिर भी...

आपकी

कलावती